Wednesday, 19 September 2018

चौधरी का आईएएस इस्तीफा देना महत्वाकांक्षा है या दूरदृष्टि


संतोष वर्मा
जगदलपुर, 26 अगस्त। पिछले दो दिनों से छत्तीसगढ़ में प्रबुद्व वर्गं के बीच आईएएस रायपुर कलेक्टर ओमप्रकाश चौधरी का इस्तीफा चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा का विषय यह इसलिए बना हुआ है क्योंकि वह एक अत्यंत साधारण परिवार से आये थे। बाल्यकाल में ही उनके पिता का साया सिर से उठ गया,  उनकी मां कौशल्या मात्र चौथी कक्षा तक पढ़ी थी। उनके दादा-दादी खेती किसानी पर निर्भर थे। उनकी मां कौशल्य ने अपने पति के पेंशन से परिवार का भरणपोषण कर ओमप्रकाश चौधरी को आईएएस बनाया।
 रायगढ जिले के छोटे से गांव बायंग निवासी ओमप्रकाश चौधरी का आईएएस बनने का सफर संघर्षों भरा रहा। श्री चौधरी ने अपने संघर्षों के बारे में कहा था कि उनके घर, गांव या आस-पास ऐसा कोई माहौल नहीं था कि उसे आईएएस बनने के लिए प्रेरित करते। उन्होंने कहा था कि पिताजी के पेंशन और अन्य जमा राशि को निकालने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए तो सरकारी सिस्टम को देखकर मन में यह बात आयी कि सिस्टम को सुधारने के लिए प्रशासनिक सेवा में होना जरूरी है..., और यहीं से वे अपनी मंजिल पाने में जूट गए।
ओमप्रकाश चौधरी बचपन से ही प्रतिभावान रहे और करीब 22 वर्ष की उम्र में आईएएस बन गये। वर्ष 2005 में आईएएस में चयन होने के बाद श्री चौधरी ने 13 वर्ष तक आईएएस के रूप में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी और जिस क्षेत्र में उनकी पदस्थापना हुई, वहां वे अपनी तेजतर्रार एवं सकारात्मक तथा ईमानदार छबि के चलते लोगों के दिलों में अपना विशेष स्थान बनाते रहे। बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिला में कलेक्टर के रूप में उनकी कार्यशैली को देखकर युवा वर्ग उनके कायल हो गए और उन्हें अपना ऑइडियल मेन मानते हुए उच्चशिक्षा प्राप्त कर उन्हीं की तरह कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार अधिकारी बनकर क्षेत्र व प्रदेश तथा देश की सेवा करने के लिए कमर कस लिए। वहीं जिनकी उम्र शासकीय सेवा के लिए पार हो चुके, वे भी उन्हें ऑइडियल मानते हुए अपने बच्चों को उन्ही की तरह बनाने के सपने देखने लगे। लेकिन राजधानी रायपुर के कलेक्टर रहते हुए कल अचानक उनके द्वारा आईएएस पद से इस्तीफा देने व भाजपा की टिकट पर खरसिया से चुनाव लडऩे संबंधी समाचार आने के बाद प्रबुद्व वर्ग के लोग अवाक रह गये, नवयुवक जिन्हें वे ऑइडियल मानते थे उनके इस्तीफा देने से उनके पांव तले जमीन खिसकने लगी और खुद को ठगा सा महसूस करने लगे।
शासकीय सेवा के लिए किस कदर आपाधापी मची है यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में एक साधारण परिवार से आईएएस बनना उनके अभिभावकों के लिए तारे तोड़ लाने के समान है। क्योंकि इसके लिए अथक पढ़ाई के साथ साथ अभिभावकों का सहयोग भी आवश्यक है और अपने संतान को इस ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए अभिभावकों, गुरूजनों का सहयोग एवं मार्गदर्शन भी आवश्यक है। देश के सबसे बड़े प्रशासनिक सेवा के लिए चयन होना परिवार व उस समाज के लिए गौरव की बात है। इस मुकाम को ओमप्रकाश चौधरी ने हासिल किया। जिस 2005 बैच से वह आये उस वेच में वह एक मात्र छत्तीसगढ़ के थे।
समाज व देश सेवा के कई माध्यम है। लोग इसके लिए सबसे अच्छा व गौरवपूर्ण माध्यम आईएएस को मानते है। क्योंकि इसके माध्यम से ही लोक सेवा के लिए देश की पूरी धरा खुली रहती है। बकौल श्री चौधरी  आईएएस के लिए मेहनत भी यही सोच कर किये थे और अपने मुकाम तक भी पहुंचे थे।
 लेकिन श्री चौधरी द्वारा आईएएस से सिर्फ इसलिए इस्तीफा देना कि वे अपनी माटी की सेवा करना चाहते है,... लोगों के गले नहीं उतर रहा है। क्योंकि इतने ऊर्जावान एवं सकारात्मक व्यक्तित्व के आईएएस अधिकारी क्या सिर्फ अपने ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की सेवा तक ही सिमटकर रह जाना चाहते है?
श्री चौधरी आईएएस से इस्तीफा देकर राजनीति में आने वाले इकलौते शख्स नहीं हैं। इसके पहले भी कई लोगों ने आईएएस से इस्तीफा देकर राजनीति में आए है और अभी उनका हाल क्या है यह किसी से छिपा नहीं है। भाजपा के यशवंत सिन्हा भी आईएएस की सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति के दांवपेंच में कूदे थे, वर्तमान में वह कहां है? कांगे्रस के पी. एल. पुनिया भी आईएएस से इस्तीफा देकर राजनीति में आए है, छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी जो एक इंजीनियर, वकील, आईपीएस. व आईएएस थे, वे भी इस्तीफा देकर राजनीति के अखाड़े में उतरे। उपरोक्त नेताओं की स्थिति अभी क्या है...? यह देखते हुए भी संघर्षशील ऊर्जावान श्री चौधरी द्वारा आईएएस से इस्तीफा देकर राजनीति में कूदना लोगों को बुद्धिमानी नहीं लग रहा है।
चंूकि श्री चौधरी अभी युवा है, ऊर्जावान है, सकारात्मक सोच के साथ ईमानदार छबि के रूप में जाने जाते है और अभी मात्र 13 साल का ही आईएएस   सेवा किए है, ऐसे में इस्तीफा देने के बजाए अगर एक दशक और आईएएस के रूप में लोक सेवा कर लेते तब राजनीति में जाते तो लोगों को स्तब्ध करने वाला फैसला नहीं लगता।
आपके संघर्षों और छबि को देखकर नवयुवक आपको ऑइडियल बना चुके थे, बस्तर में आपके कार्यशैली व व्यवहार को देखकर कई लोग अपने संतान को आपके जैस व्यक्तित्व वाले उच्चाधिकारी बनाने का सपना भी देखते थे, उन्हें आप क्या कहेंगे।  आपके इस्तीफे से उन पर क्या गुजर रही होगी, कुछ समय निकालकर इस पर अवश्य विचार करना। अगर आपको राजनीति ही करनी थी तो इसके लिए इतनी अधिक पढ़ाई की जरूरत ही क्या थी? राजनीति में पढ़ाई का कोई विशेष महत्व नहीं रहता। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का राजनीति में आना कैसे हुआ, उनकी शिक्षा क्या है...। इसी तरह छत्तीसगढ़ में कोंटा विधायक कवासी लखमा लगातार चार बार विधायक चुने जा चुके है उनने पढ़ाई कहां तक की है यह बताने की जरूरत नहीं है।
श्री चौधरी जी आप आईएएस थे, आप कभी भी अपना सेवा क्षेत्र बदल सकते थे लेकिन अब आप आईएएस नही बन पायेंगे। आप ने अपने बाल्यकाल में अपने मां के साथ सरकारी सिस्टम को देखकर इसे बदलने व इसे बेहतर करने के लिए आईएएस बनने का निश्चय किया था, और जब यह मौका आपको मिला तो आप राजनीति में चले गए।
आपको ऑइडल मान चुके नवयुवकों के अनुसार राजनीति को काजल की कोठरी माना जाता है और यहां खुद आगे बढऩे के लिए राजनीतिक लोग किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं करते है, ऐसे में आप जैसा संघर्षशील ऊर्जावान और ईमानदार व्यक्ति राजनीतिक दांवपेंच कितना चला पायेंगे यह तो वक्त ही बतायेगा।  राज्य में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने वाले है। खबरों के अनुसार आप भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लडऩे की भी तैयारी में है। खरसिया विधान सभा क्षेत्र से आपकी दावेदारी मानी जा रही है लेकिन चंूकि आप पार्टी के लिए नये सदस्य व प्रतिभावन व ऊर्जावान है इसलिए पार्टी अपने हिसाब से आपको टिकट देंगी। अगर आप चुनाव जीत गए और राज्य में भाजपा की सरकार पुन: बनती है तो आप मंत्री बन सकते हैं। हमेशा अच्छा सोचो लेकिन खराब स्थिति का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
चूंकि भाजपा को तीन कार्यकाल होने जा रहा है ऐसे में अगर मतदाताओं की इंनकमबेसी का सामना पार्टी को करना पड़ता है, तो आपकी भूमिका क्या होगी। जीत गए तो विधायक रहेंगे और कही दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो पाया तो..., एक आम कार्यकर्ता की तरह पार्टी में सिपाही की भूमिका निभानी होगी।
श्री चौधरी के इस्तीफे पर चौराहों मेें ऐसी भी चर्चा है कि आपके इस्तीफे की भूमिका अचानक स्वतंत्रता दिवस के दिन ही नहीं बनी होगी। कम से कम 2-4 माह से आप इस पर मंथन अवश्य किये होंगे। भाजपा अगर आपको मंत्री बना कर सेवा का मौका देना चाहती है तो अभी राज्य में भाजपा की ही सरकार है, चुनाव से पहले आपको मंत्री बनाकर आपका विश्वास जीता जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
श्री चौधरी आईएएस थे तब उनकी शख्सियत व सेवा की निश्चितता थी, लेकिन इसे त्यागकर अब वे जिस क्षेत्र में कदम बढ़ा रहे हैं वह अनिश्चितताओं से भरा है। शरद यादव, अमर सिंह बसपा के राष्ट्रीय नेता नशीमुद्दीन कुरैशी, अरविन्द नेताम, सुरेश पचौरी, शिव नेताम, वीरेन्द्र पाण्डे, सोहन पोटाई राजनीति के ऐसे चेहरे है जो अपने दल के सितारे थे। लेकिन आज उनकी स्थिति अनिश्चितताओं से भरी है। यही नहीं ऐसे अनेक लोग हर प्रदेश में मिलेंगे।
यह भी उल्लेखनीय है कि राजनेता जिन अधिकारियों में उनके सेवाकाल के दौरान विशेष प्रतिभा  देखते उन्हें उनके रिटायर्ड होने के बाद भी उनकी सेवावृद्वि कर उनकी सेवा लेते है। और कई बार ऐसे अधिकारियों को समाज व देशहित में विशेष दायित्व भी सौंपे जाते है। इस कड़ी में दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग, बस्तर कलेक्टर रहे श्री बैजल को रिटायर के बाद ट्राई का चेयरमेन बनाया गया।  ओमप्रकाश रावत मध्यप्रदेश में आईएएस की सेवा से चलकर आज देश के मुख्य चुनाव आयुक्त है। इसी तरह हाल ही में छत्तीसगढ़ के मुख्यसचिव के पद से रिटायर हुए श्री विवेक ढांढ को रेरा का अध्यक्ष बनाया गया है। यहां पर मेरे कहने का आशय सिर्फ यह है कि श्री चौधरी के पास फिलहाल आईएएस के रूप में समाज व देश की सेवा करने का बेहतरीन मौका था, क्योंकि राजनीति तो कभी भी पलटी मार देती है। ...खैर चौधरी सर 'हाथ कंगन का आरसी क्या, और पढ़े लिखे को फारसी क्या...।Ó सेवा के नए क्षेत्र की आपको बहुत-बहुत शुभाकामनाएं...।

o-p-choudhari
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