दंतेवाड़ा में ‘जीवनदायिनी 108’ बनी मौत का पहिया!

फर्जी केस, खटारा एम्बुलेंस और कर्मचारियों पर अत्याचार के आरोपों से घिरी आपात सेवा
दंतेवाड़ा (दिनेश गुप्ता)। नक्सल प्रभावित और संवेदनशील माने जाने वाले जिले दंतेवाड़ा में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा के रूप में संचालित 108 एम्बुलेंस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जीवन बचाने के उद्देश्य से शुरू की गई सेवा अब कथित लापरवाही, फर्जीवाड़े और कर्मचारियों के शोषण के आरोपों के कारण विवादों में है। कर्मचारियों ने संचालन कर रही कंपनी जय अंबे इमरजेंसी सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारियों पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।

खटारा गाड़ियों से कैसे बचेगी जान?
सूत्रों के अनुसार जिले में संचालित अधिकांश एम्बुलेंस 3 से 4 लाख किलोमीटर तक चल चुकी हैं और उनकी स्थिति जर्जर बताई जा रही है। कई वाहन महीनों से गैराज में खड़े हैं, लेकिन कागजों में उनकी मरम्मत दर्शाकर भुगतान निकाले जाने के आरोप हैं।
जमीनी स्तर पर कई एम्बुलेंस में सायरन बंद, हेडलाइट खराब, मरीज केबिन में रोशनी की व्यवस्था ठप तथा जीवनरक्षक दवाइयों और आवश्यक उपकरणों की कमी जैसी गंभीर खामियां बताई जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नक्सल क्षेत्र में क्या मरीजों की जिंदगी जोखिम में डाली जा रही है?
कर्मचारियों पर कार्रवाई, सुधार पर नहीं ध्यान
ईएमटी और पायलटों का आरोप है कि वाहन खराब होने की स्थिति में मेंटेनेंस दुरुस्त करने के बजाय कर्मचारियों पर ही कार्रवाई की जाती है। “नो वर्क नो पेमेंट” के नाम पर वेतन रोके जाने और मानसिक दबाव बनाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
इसके अलावा यह भी आरोप है कि अनुभवी पायलटों को हटाकर अप्रशिक्षित टेक्नीशियन से एम्बुलेंस चलवाई जा रही है, जिनके पास न पर्याप्त अनुभव है और न वैध लाइसेंस। इससे मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
90 केस का लक्ष्य और फर्जीवाड़े का दबाव
कर्मचारियों का कहना है कि प्रत्येक एम्बुलेंस को प्रतिमाह 90 केस का लक्ष्य दिया गया है। लक्ष्य पूरा न होने पर फर्जी केस दर्ज कराने का दबाव बनाया जाता है। आरोप है कि पिछले महीनों में बड़ी संख्या में केस कागजों में दर्शाकर सरकारी राशि निकाली गई।
यह आरोप सही हैं, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता है बल्कि आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ गंभीर खिलवाड़ भी है।


