सूचना के अधिकार की धज्जियां उड़ा रहा आदिम जाति कल्याण विभाग?
पत्रकार ने लगाए गंभीर आरोप, कहा- जानकारी छुपाकर गड़बड़ियों पर पर्दा डालने की कोशिश

भोपालपटनम(हिन्दसत)। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को शासन-प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था, लेकिन आदिम जाति कल्याण विभाग बीजापुर पर इस कानून की खुलेआम अनदेखी करने के आरोप लग रहे हैं। भोपालपटनम निवासी पत्रकार संजय लिखितकर ने विभागीय अधिकारियों पर सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी नहीं देने और लगातार टालमटोल करने का गंभीर आरोप लगाया है।
पत्रकार के अनुसार उन्होंने 23 सितंबर 2025 को रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से जन सूचना अधिकारी एवं प्राचार्य, एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय रुद्रारम को आवेदन भेजकर वर्ष 2024-25 में कक्षा 10वीं की छात्राओं के परीक्षा परिणाम तथा विद्यालय प्रारंभ होने से अब तक छात्राओं के मेडिकल रिकॉर्ड संबंधी जानकारी मांगी थी। आरोप है कि विभाग द्वारा न तो कोई जानकारी उपलब्ध कराई गई और न ही कोई पत्राचार किया गया।

इसके बाद 4 दिसंबर 2025 को प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं सहायक आयुक्त, आदिम जाति कल्याण विभाग के समक्ष प्रथम अपील दायर की गई, लेकिन वहां भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पत्रकार का आरोप है कि सुनवाई के दौरान जन सूचना अधिकारी अनुपस्थित रहे और आज तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
मामला तब और गंभीर हो गया जब कक्षा 10वीं की लगभग 29 छात्राओं के पूरक परीक्षा प्रकरण को लेकर सवाल उठे। आरोप है कि दो विषयों में पूरक आने वाली छात्राओं से केवल एक विषय का पूरक परीक्षा फार्म भरवाया गया, जिससे वे अनुत्तीर्ण हो गईं। पत्रकार का दावा है कि यदि दोनों विषयों का फार्म भरवाया जाता तो कई छात्राएं उत्तीर्ण हो सकती थीं। अनुत्तीर्ण होने के बाद छात्राओं को विद्यालय से टीसी देकर बाहर कर दिया गया। बाद में कुछ छात्राएं अन्य विद्यालयों में अध्ययनरत बताई जा रही हैं।
पत्रकार ने यह भी बताया कि 24 सितंबर 2025 को सहायक आयुक्त आदिम जाति कल्याण विभाग बीजापुर से संबंधित अन्य जानकारी भी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई थी, लेकिन वहां भी जानकारी नहीं दी गई। प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा 26 दिसंबर 2025 को 15 दिवस के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश जारी किया गया था, बावजूद इसके आज तक आदेश का पालन नहीं हुआ।
इसी प्रकार 4 फरवरी 2026 को दिए गए दो अन्य आरटीआई आवेदनों पर भी विभाग द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया। 17 अप्रैल 2026 को सुनवाई निर्धारित की गई थी, जिसमें आवेदक उपस्थित रहे लेकिन संबंधित अधिकारी अनुपस्थित बताए गए।
पूरे मामले को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विभाग जानकारी देने से बच क्यों रहा है? क्या विभागीय स्तर पर गंभीर लापरवाही या गड़बड़ियों को छुपाने की कोशिश की जा रही है? स्थानीय स्तर पर अब यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।


