‘बस्तर पंडूम’ शब्द के प्रयोग पर आदिवासी समाज की कड़ी आपत्ति, मुख्यमंत्री-राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन
पंडूम धार्मिक अनुष्ठान है, इसे सांस्कृतिक आयोजन के रूप में प्रस्तुत करना परंपरा का विकृतिकरण – सर्व आदिवासी समाज

बीजापुर(हिन्दसत)।अनुसूचित क्षेत्र बस्तर में “बस्तर पंडूम” नाम से आयोजित किए जा रहे शासकीय एवं सार्वजनिक आयोजनों को लेकर आदिवासी समाज ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। सर्व आदिवासी समाज, जिला बीजापुर के अध्यक्ष जग्गूराम तेलामी ने बताया कि मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल के नाम एक आपत्ति ज्ञापन समाज के प्रतिनिधियों द्वारा जिले के कलेक्टर संबित मिश्रा एवं जिला पंचायत सीईओ नम्रता चौबे को सौंपा गया।
जग्गूराम तेलामी ने कहा कि “पंडूम” कोई उत्सव, प्रदर्शन या प्रचारात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पेन परंपरा से जुड़ा एक पवित्र धार्मिक अनुष्ठान है। इसे मंचीय कार्यक्रम या सरकारी आयोजन के रूप में प्रस्तुत करना आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था और परंपरा का सीधा अपमान है।

समाज की ओर से स्पष्ट किया गया कि पंडूम में बुढ़ाल पेन, सज़ोर पेन, डांड राव पेन, गांव गोसिन सहित अन्य पेन (देवताओं) की विधिवत पूजा की जाती है। इस अनुष्ठान में परंपरागत पुजारी, सिरहा, गायता द्वारा प्राकृतिक फल, फूल, अनाज एवं वनोपज अर्पित किए जाते हैं।
यह धार्मिक प्रक्रिया निश्चित स्थान, समय, तिथि, परंपरागत व्यक्ति एवं विधि-विधान के अनुसार ही सम्पन्न होती है। इन मानकों के बिना किसी भी आयोजन को “पंडूम” कहना परंपरा का विकृतिकरण बताया गया है।
संवैधानिक उल्लंघन का आरोप
ज्ञापन में कहा गया है कि “पंडूम” शब्द का इस प्रकार शासकीय उपयोग संविधान के अनुच्छेद 244, 29, 13 एवं पेसा (PESA) अधिनियम 1996 की भावना के विरुद्ध है। इन प्रावधानों के तहत आदिवासी समाज को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
समाज की प्रमुख मांगें
सर्व आदिवासी समाज ने शासन से मांग की है कि—
- “बस्तर पंडूम” शब्द का प्रयोग सभी शासकीय आयोजनों में तत्काल बंद किया जाए।
- सभी दस्तावेजों, प्रचार सामग्री एवं मंचीय कार्यक्रमों से यह शब्द हटाया जाए।
- भविष्य में किसी भी आदिवासी परंपरागत शब्द के उपयोग से पूर्व ग्राम सभा एवं धार्मिक पदधारियों की सहमति अनिवार्य की जाए।
- अनुसूचित क्षेत्रों में सांस्कृतिक आयोजनों हेतु PESA के अनुरूप स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ।
ज्ञापन के अंत में समाज ने स्पष्ट किया कि यह विरोध किसी व्यक्ति या आयोजन के विरुद्ध नहीं, बल्कि आदिवासी धार्मिक आस्था, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से किया गया है।
इस दौरान पांडुराम तेलाम, श्रवण सैंड्रा, लक्ष्मण कड़ती, प्रवीण उईका, सतीश मंडावी सहित अन्य सामाजिक पदाधिकारी एवं प्रतिनिधि मौजूद रहे।




